कोण्डागांव: आज, 15 नवंबर को महान स्वतंत्रता सेनानी और आदिवासी नायक भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती पूरे देश में श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाई जा रही है। इस दिन को 'जनजातीय गौरव दिवस' के रूप में भी मनाया जाता है।
यह दिन झारखंड राज्य का स्थापना दिवस भी है, जो वर्ष 2000 में इसी तारीख को देश का 28वाँ राज्य बना था और इस वर्ष अपनी 25वीं वर्षगांठ (रजत जयंती) मना रहा है।
इस विशेष अवसर पर, देश के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और अन्य गणमान्य व्यक्तियों ने भगवान बिरसा मुंडा को श्रद्धांजलि अर्पित की है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनके संघर्ष और बलिदान को याद करते हुए कहा कि उनका योगदान हर पीढ़ी को प्रेरित करता रहेगा। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु, उपराष्ट्रपति और लोकसभा अध्यक्ष ने नई दिल्ली स्थित संसद परिसर में उनकी प्रतिमा पर पुष्पांजलि अर्पित की।
झारखंड में, राजधानी रांची के मोरहाबादी मैदान में भव्य राजकीय समारोह आयोजित किया गया, जहाँ राज्यपाल और मुख्यमंत्री ने राज्यवासियों को स्थापना दिवस की शुभकामनाएं दीं। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने धरती आबा बिरसा मुंडा को नमन करते हुए कहा कि झारखंड ने संघर्ष से स्थिरता और फिर समृद्धि की प्रेरक यात्रा तय की है। राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार ने झारखंड के 25 गौरवशाली वर्षों की प्रगति को प्रेरणादायक बताया। रांची के कोकर स्थित उनके समाधि स्थल पर भी राज्यपाल, मुख्यमंत्री और अन्य नेताओं ने श्रद्धांजलि अर्पित की। झारखंड सरकार ने उनके पैतृक गाँव उलिहातु में बिरसा महोत्सव को पर्यटन महोत्सव घोषित किया है।
इसके साथ ही, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और ओडिशा सहित कई अन्य राज्यों में भी बड़े पैमाने पर जनजातीय गौरव दिवस मनाया जा रहा है। छत्तीसगढ़ में सभी जिला मुख्यालयों में कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं, जिनमें मुख्यमंत्री, उप मुख्यमंत्री और अन्य मंत्री शामिल हो रहे हैं। इस दौरान जनजातीय स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के परिजनों और प्रतिभाशाली विद्यार्थियों को सम्मानित किया जा रहा है।
बिरसा मुंडा ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ 'उलगुलान' (महान विद्रोह) का नेतृत्व किया था और आदिवासी अस्मिता और स्वाधीनता के लिए 'अपना देश-अपना राज' का नारा दिया था। उनकी 150वीं जयंती के उपलक्ष्य में, केंद्र और राज्य सरकारों की विभिन्न योजनाओं और आदिवासी संस्कृति को दर्शाती प्रदर्शनियाँ भी लगाई जा रही हैं, जिससे युवा पीढ़ी उनके आदर्शों से प्रेरणा ले सक।
बिरसा मुंडा, जिन्हें आदिवासी समुदाय **'धरती आबा'** यानी पृथ्वी के पिता और **'भगवान'** के रूप में पूजता है, उनका जन्म 15 नवंबर 1875 को तत्कालीन बिहार (अब झारखंड) के खूंटी जिले के उलिहातू गाँव में हुआ था। मुंडा रीति-रिवाज के अनुसार उनका नाम बृहस्पतिवार (बृहस्पतिवार) के दिन जन्म लेने के कारण **बिरसा** रखा गया
★ प्रारंभिक जीवन और शिक्षा
उनके पिता का नाम सुगना मुंडा और माता का नाम करमी हातू था। उनका परिवार अत्यंत गरीब था और आजीविका की तलाश में उन्हें अक्सर पलायन करना पड़ता था। बिरसा मुंडा का बचपन गरीबी, संघर्ष और वन क्षेत्रों में बीता, जहाँ उन्होंने अपनी मुंडा संस्कृति और परंपराओं को गहराई से जाना।
उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा सलगा के एक स्थानीय स्कूल में और बाद में चाईबासा के **जर्मन मिशन स्कूल** में प्राप्त की। शिक्षा के दौरान ही उन्होंने ईसाई मिशनरियों के प्रभाव और आदिवासियों की दुर्दशा को करीब से देखा। इसी समय, क्षेत्र में **सरदार आंदोलन** चल रहा था, जिसने बिरसा के मन में ब्रिटिश शासन और बाहरी जमींदारों के खिलाफ विद्रोह की भावना को जन्म दिया। उन्होंने महसूस किया कि मुंडाओं की पारंपरिक व्यवस्था को बाहरी लोग, जिन्हें वे **'दिकू'** कहते थे, लगातार नष्ट कर रहे हैं।
★ सामाजिक और धार्मिक सुधारक के रूप में उदय
शिक्षा छोड़ने के बाद, बिरसा मुंडा धार्मिक और सामाजिक सुधार की ओर मुड़े। 1895 के आस-पास, उन्होंने **'बिरसाइत धर्म'** की स्थापना की। इस धर्म का उद्देश्य आदिवासियों को उनके नैतिक मूल्यों और पारंपरिक मान्यताओं की ओर लौटाना था। उन्होंने एकेश्वरवाद का प्रचार किया और **'सिंगबोंगा'** (सूर्य देव) को एकमात्र पूज्य देवता मानने का आह्वान किया। उन्होंने अंधविश्वासों, पशु बलि, और शराब के सेवन को छोड़ने का संदेश दिया।
उनके उपदेशों और उनके व्यक्तित्व से प्रभावित होकर आदिवासी समुदाय उन्हें एक दैवीय शक्ति वाला व्यक्ति मानने लगा। यह मान्यता दृढ़ हो गई कि उनके स्पर्श मात्र से बीमारियाँ ठीक हो जाती हैं। इसी कारण से, लोग उन्हें **'भगवान बिरसा मुंडा'** कहने लगे, और वह अपने समुदाय के लिए एक धार्मिक सुधारक, राजनीतिक नेता और भविष्यवक्ता बन गए।
★ 'उलगुलान' (महाविद्रोह) का नेतृत्व
बिरसा मुंडा ने आदिवासी समाज को संगठित किया और ब्रिटिश सरकार की दमनकारी नीतियों के खिलाफ **'उलगुलान'** (महान हलचल या महाविद्रोह) छेड़ा। इस विद्रोह का मूल कारण **जल, जंगल और ज़मीन** पर आदिवासियों के पारंपरिक अधिकारों का छीना जाना था। ब्रिटिश भू-राजस्व नीतियों, जैसे **खुंटकट्टी प्रणाली** को ध्वस्त करना, ने आदिवासियों को उनकी ज़मीन से बेदखल कर दिया था।
उनका आंदोलन सिर्फ ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ नहीं, बल्कि **सामंती व्यवस्था** और **जमींदारी प्रथा** के खिलाफ भी था। 1895 में उन्हें पहली बार गिरफ्तार किया गया और दो साल की जेल हुई। जेल से रिहा होने के बाद, उन्होंने अपने आंदोलन को और अधिक तीव्र किया।
जनवरी 1900 में, डोम्बारी पहाड़ी पर ब्रिटिश सेना और बिरसा मुंडा के समर्थकों के बीच एक निर्णायक और खूनी झड़प हुई। हालाँकि आदिवासियों ने बहादुरी से तीर-कमान और पारंपरिक हथियारों से लड़ाई लड़ी, लेकिन वे ब्रिटिश सेना की बंदूकों और तोपों का मुकाबला नहीं कर पाए। इस संघर्ष में सैकड़ों आदिवासी मारे गए।
★ गिरफ्तारी और शहादत
झड़प के बाद, बिरसा मुंडा किसी तरह बच निकले, लेकिन 3 फरवरी 1900 को उन्हें सिंहभूम के जामकोपाई जंगल में गिरफ्तार कर लिया गया। उन्हें राँची जेल में बंद कर दिया गया।
मात्र **25 वर्ष** की आयु में, 9 जून 1900 को, राँची जेल में उनकी मृत्यु हो गई। आधिकारिक रिकॉर्ड में उनकी मृत्यु का कारण हैजा बताया गया, लेकिन उनके अनुयायी मानते हैं कि उन्हें जेल में जहर दिया गया था।
बिरसा मुंडा का बलिदान व्यर्थ नहीं गया। उनके महाविद्रोह **'उलगुलान'** के दबाव के कारण, ब्रिटिश सरकार को **छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम (CNT Act)**, 1908 लागू करना पड़ा। यह अधिनियम आज भी आदिवासियों की भूमि को गैर-आदिवासियों को हस्तांतरित होने से रोकता है, जो उनकी अटूट विरासत और न्याय की जीत का प्रतीक है।
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